
Oct 2022
मुक़म्मल इश्क की चाह ना हुई कभी मुक़म्मल,
इसलिए नामुक़म्मल इश्क को ही,
मुक्कमल करने चला है,
उम्मीदों से सिर्फ़ नाउम्मीदी ही मिली है,
तो नाउम्मीदी में ही उम्मीद खोजने निकल प़डा है,
ऐ बेलिहाज़, तु किससे लड़ता है ?
अपनी क़िस्मत , कुदरत की फ़ितरत ,
ज़माने का दस्तूर, या तेरे ही मन का ही फितूर ?
अपनी हर शिकस्त को जो अपनी जीत बताता है तू ,
ऐ बेलिहाज़, क्यूँ खुद से ही लड़ता है?